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वाणी

धर्मशास्त्रों में वाणी संयम पर बहुत बल दिया गया है। मनुस्मृति में कहा गया है
पारुष्यमनृतं चैवं पैशुन्यं चापि सर्वशः। असंबद्ध प्रलापश्च वांगमयं स्याच्चतुर्विधम्।
अर्थात् वाणी में कठोरपन लाना, झूठ बोलना, दूसरे के दोषों का वर्णन करना और व्यर्थ बातें बनाना, ये वाणी के चार दोष हैं। इन दोषों से बचने वाला व्यक्ति हमेशा सुखी और संतुष्ट रहता है।
किसी कवि ने कहा था, ‘रसों में रस निंदा रस है।अनेक श्रद्धालु भगवद्कथा सुनने जाते हैं, तीर्थों सत्संगों में जाते हैं, किंतु वहां भी भगवल्लीला के अनूठे प्रेम रस भक्ति रस से तृप्त होने की जगह निंदा रस का रसास्वादन करने में नहीं हिचकिचाते। मौका मिलते ही दूसरों की निंदा और दोष वर्णन करने में लग जाते हैं। संस्कृत में दूसरे के दोष देखने कोपैशुन दोषकहा गया है। 

धर्मशास्त्रों में पंचविध चांडालों में पैशुनयुक्त पुरुष को भी एक प्रकार का चांडाल माना गया है। एक संस्कृत श्लोक में बताया गया है कि दूसरे व्यक्ति में दोष देखने वाला, दूसरों के अवगुणों का वर्णन करने वाला, किए गए उपकार को याद रखने वाला तथा बहुत देर तक क्रोध को मन में रखने वाला व्यक्ति चांडाल श्रेणी में ही आता है। पैशुन दोष को वाणी के तप द्वारा जीतने की प्रेरणा देते हुए महर्षि कहते हैं, ‘उद्वेग से रहित वाणी का उच्चारण, सत्य, प्रिय और हितकर वचन बोलना, अनर्गल बातचीत में समय व्यर्थ करके सत्साहित्य का अध्ययन करना एवं भगवन्नाम का कीर्तन करना वाणी का तप कहलाता है। अतः वाणी से प्रत्येक शब्द सोच-समझकर निकालने में ही लाभ होता है।

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