संत कवि हरिदास

निरंजनी संप्रदाय के संत कवि हरिदास युवावस्था में कुसंग में पड़कर अपराधों में लिप्त रहने लगे थे। तब उनका नाम हरि सिंह हुआ करता था। एक दिन वह और उनके साथी राहगीरों को लूट रहे थे, तभी एक भगवाधारी साधु वहां से गुजरा। डाकू हरि सिंह ने साधु को रोका। साधु ने कहा, ‘मैं तो मांगकर काम चलाता हूं। साधु को तो वैसे भी छोड़ देना चाहिए।’ हरि सिंह ने कहा, ‘बातें न बना, पोटली खोल।’ साधु ने पोटली खोली। उसमें कुछ रुपये थे। हरि सिंह ने वे रुपये ले लिए। लुटेरों की नजर पोटली में पड़ी एक पुड़िया पर पड़ी, उनमें से एक ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया, तो साधु ने कहा, ‘इसे मत छीनो। यह दवा की पुड़िया है। गांव का एक व्यक्ति मरणासन्न है। मैं उसके लिए यह औषधि लाया हूं।’ हरि सिंह ने साधु के ये शब्द सुने, तो वह हक्का-बक्का रह गए। उन्हें लगा कि यह साधु कितना महान है। इसके हृदय में कितनी दया भावना है। वह साधु के पैरों में गिर पड़े और उसके रुपये वापस करते हुए बोले, ‘बाबा, आज से आप मेरे गुरु हैं। मुझे आशीर्वाद दें कि मैं भविष्य में लूट-मार जैसा अधर्म न करूं।’ साधु ने हरि सिंह को उपदेश देते हुए कहा, ‘बेटा, कभी किसी कुसंगी का साथ न करना। भगवान तुम पर कृपा करेंगे।’ आगे चलकर यही हरि सिंह निरंजनी संप्रदाय के सुविख्यात संत हरिदास निरंजनी के नाम से विख्यात हुए। उन्होंने अनेक भक्ति-पदों की रचना की।
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