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अमृतत्व

उपनिषद् में कहा गया है, न कर्मणा, न प्रजया, धनेन, त्यागेन चैके अमृतत्वमानशुः। श्रेष्ठ लोगों ने कर्म और धन से नहीं, अपितु त्याग से ही अमृतत्व प्राप्त किया है। हमारी संस्कृति में अर्थ, अर्थात धन के महत्व को स्वीकार किया गया है, किंतु धन से मात्र आवश्यकता की पूर्ति करते हुए उसे सत्कर्मों में व्यय करने की प्रेरणा दी गई है। जो धन-संपदा का संचय न कर त्याग करने को तत्पर रहता है, वही जीवन मुक्त हो सकता है।

अर्जित धन को सत्कर्मों में लगाने को ‘यज्ञ’ कहा गया है। यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि को समिधा समर्पित करना मात्र नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, यज्ञशिष्टाशिनः संतो कारणात् यानी, हम जो अर्पित करते हैं, उसमें देवता, ऋषि, पितर, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदि का भाग है। हम इन सभी से कुछ न कुछ प्राप्त करते हैं, अतः इन सभी के ऋणी हैं। अतएव इनका भाग इन्हें यथायोग्य दे देना यज्ञ है। इसलिए प्राचीन काल से ही भोजन तैयार करते समय पहली रोटी गाय के लिए, एक रोटी कुत्ते आदि मूक प्राणी के लिए रखने का प्रचलन है। कहा गया है, ‘जो मनुष्य अपनी अर्जित आय में से सभी का भाग देने के बाद बचे हुए अन्न को खाता है, वह अमृत खाता है। जो ऋण न चुकाकर, धन को अपना समझ अकेला हड़प जाता है, वह पाप का भागी बनता है।’

जब से धर्मग्रंथों के इन वचनों की अवहेलना करके धन-संपत्ति के अधिकाधिक संचय और अंधाधुंध उपभोग की प्रवृत्ति पनपी है, तब से असीमित इच्छाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य गलत तरीके से भी धनार्जन करने में नहीं हिचकिचाता।

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