अतिथि

अतिथि देवो भवः यानी अतिथि को देवता मानकर उसका सत्कार करना हमारी संस्कृति रही है। पुराणों, बाइबिल और अन्य धर्मग्रंथों में अनेक प्रसंग मिलते हैं कि किस तरह घर आए व्यक्ति को स्वयं भूखा रहकर भी भोजन दिया जाता है। चीनी यात्री ह्वेन सांग ने लिखा है, ‘मैं भारत यात्रा के दौरान जिस परिवार में पहुंचता था और पानी मांगता था, वह पानी की जगह दूध या छाछ से भरा गिलास पेश करता था।’
 छांदोग्योपनिषद् का प्रसंग है। अभिप्रतापी नामक सद्गृहस्थ शौनिक एवं कथासेन के साथ बैठे भोजन कर रहे थे। अचानक एक भिक्षुक वहां आ पहुंचा तथा विनयपूर्वक बोला, ‘मैं भी भूखा हूं। मुझे भी भोजन दें।’ अभिप्रतापी ने कहा, ‘हम खुद द्वारा अर्जित धन से बनाए गए भोजन का उपयोग कर रहे हैं। इसमें दूसरे का अधिकार कैसा?’ भिक्षुक चुपचाप द्वार के कोने पर बैठ गया। जब भोजन के बाद अभिप्रतापी बाहर निकले, तो उस भिक्षुक ने कहा, ‘भोजन देवता व चार ऋषियों की तृप्ति के लिए पकाया जाता है। तुम उन्हें भोजन कराए बिना कैसे तृप्त हो सकते हो?’ भिक्षुक ने आगे कहा, ‘प्राण ही देव है। जल, पवन, अग्नि और वायु उसके चार ऋषि हैं। ये चारों एक ही महाप्राण का पोषण करते हैं। समस्त प्राणधारी उसी के घटक हैं। मेरे प्राण भी आपके प्राण की तरह हैं। मैंने प्राणों की रक्षा के लिए कुछ भोजन मांगा। क्या उस समय शास्त्र वचन भूल गए कि सभी प्राणी भगवान के स्वरूप हैं।’ भिक्षुक के ये शब्द सुनकर अभिप्रतापी की आंखों में पश्चाताप के आंसू आ गए।
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