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संपत्ति

एक बार भीष्म पितामह हस्तिनापुर में मुनि शम्पाक का सत्संग कर रहे थे। भीष्म ने प्रश्न किया, ‘मुनिवर, हम धनी और निर्धन, दोनों को किसी न किसी रूप में असंतुष्ट व दुखी देखते हैं। आपकी दृष्टि में जिसके पास अथाह धन है, जिस पर लक्ष्मी की कृपा है, वह दुखी और असंतुष्ट किस कारण रहता है।’
 मुनि शम्पाक बताते हैं, ‘आवश्यकता से अधिक धन जिसे प्राप्त हो जाता है, उसमें अहंकार आना स्वाभाविक है। अत्यधिक संपत्ति अपने साथ अनेक दुर्गुण लेकर आती है। वह सबसे पहले मति हरती है। बिना परिश्रम के जिसे असीमित धन मिल जाता है, वह कुरूप होते हुए भी खुद को रूपवान समझने लगता है, मूर्ख होते हुए भी खुद को बुद्धिमान समझने लगता है। सात्विकता और सरलता का त्याग कर वह भोग-विलास में डूब जाता है। उसकी इच्छाएं दिनोंदिन बढ़ने लगती हैं। यही उसके पतन का कारण बनता है।’ मुनि ने आगे बताया, ‘लक्ष्मी उस मूर्ख को मोह में डालती रहती है। वायु जैसे शरद ऋतु के बादलों को उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार लक्ष्मी उसके चित्त को हर लेती है। धन का अंधाधुंध उपभोग करते रहने के कारण अंत में एक दिन वह धनहीन हो जाता है। दरिद्र हो जाने पर उसे और अधिक कष्ट भोगने पड़ते हैं।’
 कुछ क्षण रुककर मुनि ने फिर कहा, ‘यदि धनी स्वतः धन का सत्कर्मों में उपयोग करे, संयमी व सात्विक बना रहे, धन को अपना न मानकर भगवान का दिया प्रसाद मान ले, धन का किंचित अहंकार न करे, तो धनविहीन हो जाने पर भी उसे दुख नहीं होता।’

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आगमन संख्‍या

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