पाप

यदि मनुष्‍य पाप कर भी ले तो पुन: न दोहराये, न उसे छुपाये और न ही उसमें रत हो। पाप का संचय ही सब दु:खों का मूल है। --- गौतम बुद्ध 
एक टिप्पणी भेजें